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04 अगस्त 2019

9:23 am

Raksha Bandhan » Know Rakhi Festival Raksha Bandhan in History in hindi


Raksha Bandhan In History
 The traditional Hindu festival ' Raksha Bandhan ( knot of protection ) was came into origin about 6000 years back when Aryans created first civilization - The Indus Valley Civilization . With many languages and cultures , the traditional method to Rakhi festival celebration differs from place to place across India . Following are some historical evidences of Raksha Bandhan celebration from the Indian history .



रक्षा बंधन इतिहास
 में पारंपरिक हिंदू त्योहार 'रक्षा बंधन' (रक्षा की गाँठ) लगभग 6000 साल पहले शुरू हुआ था जब आर्यों ने पहली सभ्यता - सिंधु घाटी सभ्यता बनाई थी।  कई भाषाओं और संस्कृतियों के साथ, राखी के त्यौहार समारोह के लिए पारंपरिक विधि भारत भर में जगह-जगह भिन्न होती है।  भारतीय इतिहास में रक्षा बंधन उत्सव के कुछ ऐतिहासिक प्रमाण हैं।

Rani Karnawati and Emperor Humayun The story of Rani Karnavati and Emperor Humayun is the most significant evidence in the history. During the medieval era, Rajputs were fighting Muslim invasions. Rakhi at that time meant a spiritual binding and protection of sisters was foremost. When Rani Karnawati the widowed queen of the king of Chittor realised that she could in no way defend the invasion of the Sultan of Gujarat, Bahadur Shah, she sent a rakhi to Emperor Humayun. The Emperor touched by the gesture started off with his troops without wasting any time.



रानी कर्णावती और सम्राट हुमायूँ रानी कर्णावती और सम्राट हुमायूँ की कहानी इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण सबूत है।  मध्यकालीन युग के दौरान, राजपूत मुस्लिम आक्रमणों से लड़ रहे थे।  उस समय राखी का मतलब आध्यात्मिक बंधन था और बहनों की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण थी।  जब रानी कर्णावती ने चित्तौड़ के राजा की विधवा रानी को महसूस किया कि वह किसी भी तरह से गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण का बचाव नहीं कर सकती हैं, तो उन्होंने सम्राट हुमायूँ को राखी भेजी।  बादशाह द्वारा छुआ गया सम्राट बिना किसी समय बर्बाद किए अपने सैनिकों के साथ शुरू हुआ।
Alexander The Great and King Puru
 The oldest reference to the festival of rakhi goes back to 300 B.C. at the time when Alexander invaded India. It is said that the great conqueror, King Alexander of Macedonia was shaken by the fury of the Indian king Puru in his first attempt. Upset by this, Alexander's wife, who had heard of the Rakhi festival, approached King Puru. King Puru accepted her as his sister and when the opportunity came during the war, he refrained from Alexander


अलेक्जेंडर द ग्रेट और किंग पुरु 
राखी के त्योहार का सबसे पुराना संदर्भ 300 ई.पू.  जिस समय सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया।  ऐसा कहा जाता है कि महान विजेता, मैसेडोनिया के राजा अलेक्जेंडर ने अपने पहले प्रयास में भारतीय राजा पुरु के रोष से हिल गया था।  इससे परेशान होकर, सिकंदर की पत्नी, जिसने राखी त्योहार के बारे में सुना था, राजा पुरु के पास पहुंची।  राजा पुरु ने उसे अपनी बहन के रूप में स्वीकार किया और जब युद्ध के दौरान अवसर आया, तो उसने सिकंदर से परहेज किया

Lord Krishna and Draupathi 
In order to protect the good people, Lord Krishna killed the evil King Shishupal. Krishna was hurt during the war and left with bleeding finger. Seeing this, Draupathi had torn a strip of cloth from her sari and tied around his wrist to stop the bleeding. Lord Krishna, realizing her affections and concern about him, declared himself bounded by her sisterly love. He promised her repay this debt whenever she need in future. Many years later, when the pandavas lost Draupathi in the game of dice and Kauravas were removing her saari, Krishna helped her divinely elongating the saari so that they could not remove it.



भगवान कृष्ण और द्रौपती अच्छे लोगों की रक्षा के लिए, भगवान कृष्ण ने दुष्ट राजा शिशुपाल को मार डाला।  युद्ध के दौरान कृष्ण को चोट लगी और खून बह रहा था।  यह देखकर, द्रौपदी ने अपनी साड़ी से कपड़े की एक पट्टी फाड़ दी थी और रक्तस्राव को रोकने के लिए अपनी कलाई पर बांध लिया था।  भगवान कृष्ण ने उसके प्यार और उसके बारे में चिंता को महसूस करते हुए, खुद को उसके बहन प्रेम से बंधे घोषित कर दिया।  उन्होंने भविष्य में जब भी जरूरत हो, इस कर्ज को चुकाने का वादा किया।  कई साल बाद, जब पाण्डव पासा के खेल में द्रौपती को खो बैठे और कौरव अपनी साड़ी को हटा रहे थे, तो कृष्ण ने साड़ी को बढ़ाने में उनकी मदद की ताकि वे इसे हटा न सकें।
King Bali and Goddess Lakshmi
 The demon king Mahabali was a great devotee of lord Vishnu. Because of his immense devotion, Vishnu has taken the task of protecting bali's Kingdom leaving his normal place in Vikundam. Goddess lakshmi - the wife of lord Vishnu has ecame sad because of this as she wanted lord Vishnu along with her. So she went to Bali and discussed as a Brahmin woman and taken refuge in his palace. On Shravana purnima, she tied Rakhi on King Bali's wrist. Goddess Lakshmi revealed who she is and why she is there. The king was touched by Her and Lord Vishnu's good will and affection towards him and his family, Bali requested Lord Vishnu to accompany her to vaikuntam. Due to this festival is also called Baleva as Bali Raja's devotion to the Lord vishnu. It is said that since that day it has become tradition to invite sisters on sravan pournima to sacred thread of Rakhi or Raksha bandan


राजा बलि और देवी लक्ष्मी
 राक्षस राजा महाबली भगवान विष्णु के बहुत बड़े भक्त थे।  अपनी असीम भक्ति के कारण, विष्णु ने बाली के साम्राज्य को विकुंडम में अपना सामान्य स्थान छोड़ने के लिए सुरक्षित रखने का काम किया।  देवी लक्ष्मी - भगवान विष्णु की पत्नी इस वजह से दुखी हैं क्योंकि वे भगवान विष्णु को अपने साथ चाहती थीं।  इसलिए वह बाली के पास गई और एक ब्राह्मण महिला के रूप में चर्चा की और अपने महल में शरण ली।  श्रावण पूर्णिमा पर, उन्होंने राजा बलि की कलाई पर राखी बांधी।  देवी लक्ष्मी ने खुलासा किया कि वह कौन है और वह क्यों है।  राजा को उसके और भगवान विष्णु की अच्छी इच्छा और उसके और उसके परिवार के प्रति स्नेह से स्पर्श हुआ, बाली ने भगवान विष्णु से वैकुंठम जाने का अनुरोध किया।  इस त्यौहार के कारण बेलवा को बाली राजा की भगवान विष्णु की भक्ति भी कहा जाता है।  ऐसा कहा जाता है कि उस दिन के बाद से राखी या रक्षा बंधन के पवित्र धागे में बहनों को आमंत्रित करने की परंपरा बन गई है

12 अप्रैल 2019

1:04 pm

जिस दासी के कारण से श्रीराम को वनवास हुआ वह मंथरा वास्तव में कौन थी

रामायण में मंथरा एक ऐसा पात्र है जिसके कारण भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मणजी को वनवास जाना पड़ा. श्रीराम को वनवास जाना पड़ा उसमे एक तरह से समाज का और देवताओं का कल्याण ही था क्योंकि श्रीराम ने वनवास के दौरान ही रावण का अंत किया था. श्रीराम को अगर वनवास नहीं होता तो श्रीराम रावण का वध करके अपना अवतार कार्य कैसे पूर्ण करते यह भी एक सोचने की बात है.
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दोस्तों रामायण की तरह महाभारत भी एक बहुत बड़ा ग्रंथ है और इस महान ग्रंथ में भगवान राम के चरित्र का वर्णन भी आता है. उस वर्णन के अनुसार जब राक्षसराज रावण से भयभीत होकर देवता ब्रह्माजी की शरण में गए थे तब ब्रहमाजी ने देवताओं को कहा अब रावण का अंत निकट है, तुम सब भी रींछ और वानर रूप में पृथ्वी पर अवतार धारण करो और भगवान राम की सहायता करो.

उस समय देवताओं ने एक दुंदुभी नाम की गंधर्वी को बुलाया और कहा तुम पृथ्वी पर जन्म धारण करो और वहां पर तुम्हे कैकेयी की दासी बनना है और तुम्हे किसी तरह भगवान राम को वन में जाने के लिए सहायता करनी है. उस समय उस दुंदुभी नाम की गंधर्वी ने श्रीराम को वन में भेजने का दायित्व स्वीकार कर लिया.
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उसके बाद वहीँ गंधर्वी पृथ्वी पर कुब्जा के रूप में जन्मी. उस समय उसका नाम मंथरा रखा गया और वहीँ राजा दशरथ की छोटी रानी कैकेयी की दासी बनी थी. उस समय मंथरा ने अपना वह कार्य किया जिस कार्य के लिए देवताओं ने उसे पृथ्वी पर भेजा था. उसने रानी कैकेयी के मन में रामजी के प्रति संदेह उत्पन्न कर दिया जिस कारण से रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से श्रीराम को वनवास देने की मांग की और श्रीराम को अपने पिता का वचन पूर्ण करने के लिए वन में जाना पड़ा और फिर आगे के घटनाक्रम में श्रीराम ने रावण का वध करके देवताओं का कार्य संपूर्ण किया और पृथ्वी पर धर्म मर्यादा की स्थापना की.
12:55 pm

फूलन देवी की कुछ अनदेखी बातें और पढ़े एक आम लड़की कैसे बनी डकैत

इनका जन्म 10 अगस्त 1963 में यूपी से एक गोहरा नाम के गांव में हुआ था, लेकिन जन्म के साथ ही उनके साथ जातिगत मतभेद होना स्टार्ट हो गया था। इसके पश्चात 11 वर्ष की उम्र में ही फूलन देवी के घर वालों ने उनकी विवाह करवा दिया, लेकिन फूलन देवी के पति और उनके परिवार के प्रताड़ना से फुलन देवी तंग आ चुकी थी और वह ससुराल छोड़कर अपने पिता के पास वापस आई और मजदूरी में पिता का हाथ बढ़ाने लगी।
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लेकिन इसके बाद जिंदगी में बहुत बड़ी घटना घटित हुई गांव के कुछ लोगों ने मिलकर फूलन देवी का बलात्कार कर दिया और फूलन देवी अपने लिए न्याय के लिए दर-दर भटकने लगे, लेकिन देश के कानून ने उनकी एक बात नहीं सुनी, फिर इसका बदला लेने के लिए उन्होंने हथियार उठाने का मन बनाया।

फिर फूलन देवी की मुलाकात विक्रम मल्लाह से हुई। इन दोनों ने मिलकर डाकुओं का संगठन तैयार किया और फूलन देवी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं में आने लगे अपना बदला लेने के लिए उन्होंने 1981 को जिन लोगों ने उनका बलात्कार किया था। उनकी हत्या कर दी। इसके बाद पूरे चंबल में फूलन देवी का खौफ आ गया और सरकार ने फूलन देवी को पकड़ने का फरमान जारी किया, लेकिन पुलिस फूलन देवी को पकड़ने में कामयाब नहीं हो पाई।
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और 1983 की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने फूलन देवी को सरेंडर करने के लिए बोला। उससे पहले गवर्नमेंट से फूलन देवी ने कुछ मांगे रखी टैली उनकी किसी भी साथी को मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा और दूसरी उनके किसी भी शादी को 8 वर्ष से ज्यादा जेल में नहीं रखा जाएगा और सरकार ने फूलन देवी की सारी शर्तें मान ली।

मगर 11 वर्ष तक फूलन देवी को बिना कोई कैसे चलाएं जेल के अंदर रखा गया। जिसके पश्चात 1994 को समाजवादी सरकार की और सरकार ने फूलन देवी को रिहा करवा दिया और 1996 में समाजवादी पार्टी ने फूलन देवी को अपनी पार्टी की तरफ से चुनाव लड़ने के लिए बोला और फूलन देवी मिर्जापुर सीट से संसार बनने में सफल हुई और दिल्ली पहुंच गई।

इसके पश्चात 2001 में शेर सिंह राणा ने फूलन देवी के निवास में फूलन देवी की हत्या कर दी और कहा कि ये सर्वेणो की मौत का बदला है, लेकिन कई जगह में फूलन देवी की हत्या को राजनीतिक षड्यंत्र भी माना गया। इस तरह से फूलन देवी की जिंदगी का अंत हो गया और अपनी एक स्टोरी हो। हिंदुस्तान में छोड़ गई जानकारी के लिए आपको बताना चाहते है, कि फूलन देवी पर बैंडिट क्वीन नाम की फिल्म भी बन चुकी है। जिसे शेखर कपूर ने डायरेक्ट किया था, लेकिन इस फिल्म से फूलन देवी को आपत्ति होने की वजह से इस फिल्म को सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया।

25 मार्च 2019

5:54 pm

जानिए मृत्यु के बाद मनुष्य किस रूप में फिर से जन्म लेता है

इस संसार में वह एक ही जिसका टलना असंभव है और उसे मृत्यु के नाम से जाना जाता है परंतु मृत्यु तो शरीर को आती है और आत्मा के शरीर छोड़कर दुसरा शरीर धारण कर लेती है. प्राचीन समय में एक महान राजा हुए जिनका नाम भरत था. जब उन्हें लगा कि अब राज्य को छोडकर मोक्ष के मार्ग पर जाना चाहिए तो उन्होंने उनकी पत्नी और पुत्रों का त्याग कर दिया और सन्यास धारण करते हुए वन में चले गए.
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एक समय की बात है जब भरत मुनि नदी किनारे स्नान कर रहे थे तब वहां पर एक गर्भवती हरिनी पानी पीने के लिए वहां पर आई और उसी समय एक सिंह भी उस स्थान पर आ गया. सिंह के भय से हरिनी ने छलांग लगाईं और उसी समय उसका बच्चा गर्भ से पानी में गिर गया और हरिनी की मृत्यु हो गई.


भरत मुनि को उस मृग बच्चे पर दया आ गई और वह उस बच्चे को अपने साथ ले गए. भरत मुनि ने सोचा यह बालक बगैर माँ का अकेला है,इसका मेरे सिवा कौन है, वह मुझे ही माता पिता मानता है इसलिए मुझे उसका पूरा पालन पोषण करना चाहिए. धीरे धीरे भरत मुनि के मन में मृग के बच्चे के लिए आसक्ति बढ़ गई.

जिस मोक्ष को पाने के लिए भरत मुनि ने अपने पुत्रों का त्याग कर दिया उसी मोक्ष को वह एक मृग शिशु के लिए भूल गए. उस मृग का पालन करने के लिए उन्होंने सन्यासी के धर्म का त्याग कर दिया. उनसे योग भी छुट गया और इश्वर का ध्यान भी उन्होंने छोड़ दिया. रात्री और दिवस उनके मन में केवल उस मृग के विषय में ही चिंत्ता रहती थी.


उसके बाद एक ऐसा समय आया जब मृत्यु उनके निकट थी. अंत समय में भी उनको उस मृग का ध्यान था. वह मृग भी भरत मुनि के सामने बैठ कर आंसू बहा रहा था. इस तरह उस मृग को देखते देखते भरत मुनि के प्राण निकल गए और उसके बाद भरत मुनि ने उनके अंतकाल की भावना के अनुसार साधारण मनुष्यों की भांति मृग के रूप में फिर से जन्म लिया.

उस मृग जन्म में उन्होंने अपने पूर्व जन्म की तपस्या के फल स्वरूप उनको अपने मृग बनने का कारण ज्ञात रहा और उनको इस बात का बहुत पस्तावा रहा कि मोक्ष के इतने निकट आकर भी उन्हें मोह हुआ और फिर से उन्हें जन्म मृत्यु के चक्र में फंसना पड़ा. इस कथा के एक बात की शिक्षा मिलती है कि मनुष्य के जैसे विचार होते है वैसी ही उसकी गति होती है. मनुष्य की यह गति उसके वर्तमान समय में भी हो सकती है और आनेवाले जन्म में भी हो सकती है. मनुष्य अपने विचारों के आधार पर ही दुसरा जन्म प्राप्त करता है.

22 मार्च 2019

10:47 am

महाराणा प्रताप के दादा की वह सबसे बड़ी गलती जिसने भारत को 300 साल तक गुलाम बना दिया


दोस्तों महाराणा प्रताप के दादा राणा सांगा की एक गलती ने भारत को 300 साल तक गुलाम बना दिया था। जब भारत पर इब्राहिम लोधी राज कर रहा था तो राणा सांगा ने इब्राहिम लोधी को हराकर दिल्ली पर राज करने का निर्णय लिया था।

संग्राम सिंह का जन्म 12 अप्रैल 1484 को Malwa , Rajasthan में हुआ | इनके पिता का नाम Rana Raimal था जो की मेवाड़ के राजपूत शासक थे | राणा सांगा का विवाह RaniKarnavati के साथ हुआ | अपने भाइयों के खिलाफ लंबे समय तक सत्ता संघर्ष के बाद , 1508 में मेवाड़ के राजा के रूप में राणा सांगा ने अपने पिता राणा रियाल के साम्रज्य का उत्तराधिकारी बने |

लेकिन वह इब्राहिम लोधी इतना ताकतवर था की वह उसकी सेना को हरा नही पा रहे थे। तब उसने लोधी को कमजोर करने के लिए बाबर को भारत आने का आमंत्रण दिया।

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बाबर ने भारत आने का आमंत्रण भी स्वीकार कर लिया और जिसके बाद बाबर ने लोधी को हरा दिया। लेकिन बाबर को भारत बहुत पसंद आया और उसने भारत मे ही निवास करने का निर्णय ले लिया।

लेकिन सांगा को यह स्वीकार नही था। इसके बाद सन 1527 में बाबर ने सांगा को हराकर भारत में मुगल सम्राज्य की नींव रखी। उसके बाद बाबर के वंशजो ने भारत पर 300 साल तक राज किया था

काफी कम लोग ही जानते हैं की राणा | सांगा ने हार के बाद फिर से अपनी सेना | को एकत्रित किया और बबार के ऊपर attack करने के योजना बनाने लगे | पर war से ठीक कुछ दिन पहले वह अपने । camp में बीमार पड़ गए और उनकी death हो गयी | ऐसा भी बोला जाता है । की उनके कोई विस्वासपात्र ने ही उनके खाने में जहर मिला कर उन्हें मार दिया | | और इस तरह महान Rana Sanga की death हुई | इनकी मृत्यु होने के बाद उनकी पत्नी RaniKarnavati ने जौहर कर लिया ( आत्म - बलिदान ) ताकि मुस्लिम आक्रमणकारियों के हाथों गुलाम / बलात्कार से बचा जा सके ।
6:36 am

क्यों देवराज इंद्र ने दिया था समस्त स्त्रियों को मासिक धर्म का श्राप, यह था इसका कारण

पौराणिक कथाओं में स्त्रियों को मासिक धर्म आने का कारण देवराज इंद्र को बताया गया है | ऐसा माना जाता है कि इंद्र के श्राप के कारण ही ऐसा हुआ था | आइये जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा के बारे में |

Ngallinone

एक बार स्वर्गलोक पर दैत्यों ने धावा बोल दिया दिया और देवराज इंद्र से उनका सिंघासन छीन लिया गया |देवराज इंद्र इसके समाधान के लिए ब्रह्माजी के पास पहुंचे | ब्रह्मा ने इंद्र से कहा कि वे भूलोक जाकर किसी परमज्ञानी मनुष्य की सेवा करें, जिसके बाद उन्हें स्वर्ग दोबारा प्राप्त हो जाएगा | देवराज ने ऐसा ही किया और एक ब्रह्मज्ञानी की सेवा में जुट गये |



उस परमज्ञानी मनुष्य की माता एक दैत्य ही थीं इसलिए इंद्र जो भी पूजा सामग्री उपयोग करते वे सभी अनजाने में असुरों को ही प्राप्त हो रही थीं | जब देवराज इंद्र को इस सत्य का ज्ञान हुआ तो वे क्रोध से भर उठे और उस ब्रह्मज्ञानी मनुष्य की हत्या कर दी |इंद्र को ब्रह्म हत्या का घोर पाप लगा | इस पाप से मुक्ति के लिए उन्होंने सहस्त्रों वर्ष तक भवगान श्री हरि विष्णु की तपस्या की | भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर देवराज इंद्र को सुझाव दिया कि वे इस पाप को पृथ्वी, जल, पेड़ और स्त्रियों में बाँट सकते हैु लेकिन इस पाप के एवज में उन्हें सभी को कुछ वरदान भी देना होगा |


देवराज ने पृथ्वी को श्राप देने के बाद उन्होंने वरदान दिया कि चाहे जितनी चोट की जाए पृथ्वी के घाव पुनः भर जाएँगे | पेड़ों को श्राप दिया लेकिन वरदान में उन्होंने कहा कि पेड़ पौधे स्वयं को कभी भी पुनः जीवित कर सकेंगे | जल को वरदान दिया कि वह पृथ्वी पर उपस्थित सभी वस्तुओं को स्वच्छ कर सकेगा | स्त्रियों को इंद्र ने मासिक धर्म का श्राप दिया लेकिन इसके एवज में उन्होंने स्त्रियों को पुरुषों की अपेक्षा अधिक रति आनंद प्राप्त होने का वरदान भी दिया | आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए कृपया हमें फॉलो करें |

21 मार्च 2019

8:40 am

इतिहास की वह हसीन स्त्री जिस पर भारत के इस सम्राट ने सब कुछ लुटा दिया

दोस्तों भारत के सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ग्रीस के राजा सेल्युकस से की लड़की हेलेना से बहुत प्यार करते थे। जब चन्द्रगुप्त ने हेलेना को पहली बार देखा तो उन्होंने हेलेना से शादी करने का निर्णय कर लिया था। दोस्तों हेलेना और चन्द्रगुप्त मौर्य सबसे पहले एक युद्ध के मैदान में मीले थे।

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सिकंदर महान के सेनापति सेल्यूकस निकेटर की बेटी का नाम हेलेना था़  एक दिन हेलेना ने चंद्रगुप्त को सात-सात सैनिकों के साथ तलवारबाजी करते देखा. एक साथ सातों उनके ऊपर वार करते और वह हंसते-हंसते उनके वारों को काट डालत़े  तभी वह उन्हें अपना दिल दे बैठी. एक तरह से चंद्रगुप्त और हेलेना की शादी यूनानी और भारतीय संस्कृति का मिलन थी और संदेश यह कि युद्ध पर प्यार भारी पड़ता है़ हेलेना सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस निकेटर की बेटी थी़  चूंकि सिकंदर का कोई वारिस नहीं था, इसलिए उसकी मौत के बाद उसके साम्राज्य को उसके सेनापतियों ने आपस में बांट लिया़  सेल्यूकस को साम्राज्य का पूर्वी हिस्सा प्राप्त हुआ, जिसमें भारत का उत्तर-पश्चिमी हिस्सा भी शामिल था़  सेल्यूकस की बेटी हेलेना एक अपूर्व सुंदरी थी, जिसे अपना बनाने की चाहत कई यूनानी नौजवान रखते थ़े  लेकिन हेलेना की आंखें तो किसी और को ढूंढ़ रही थीं और वह थे चंद्रगुप्त मौर्य. दरअसल बात उन दिनों की है, जब चंद्रगुप्त अपने गुरु चाणक्य की देख-रेख में वाहीक प्रदेश में युद्ध विद्या का अभ्यास कर रहे थ़े  वह अभी पाटलीपुत्र के राजा नहीं बने थ़े  एक दिन हेलेना ने देखा कि एक रोबीला और सुगठित शरीर वाला नौजवान एक साथ सात-सात सैनिकों से तलवार पर हाथ आजमा रहा है.  एक साथ सातों उसके ऊपर वार करते और वह हंसते-हंसते उनके वारों को काट डालता़  अपने वार को बार-बार खाली जाता देख वे सातों खीझ उठे और अब वे अभ्यास के लिए नहीं, बल्कि घातक वार करने लगे, लेकिन वह नौजवान तो अब भी हंसे जा रहा था और आसानी से उनके वारों को विफल कर रहा था़   यह नौजवान चंद्रगुप्त मौर्य था, जिसके सुंदर रूप, शालीन व्यवहार और तलवारबाजी के दावं-पेंच से हेलेना मंत्नमुग्ध होकर उन्हें अपना दिल दे बैठी़  हेलेना हमेशा चंद्रगुप्त को एक नजर देखने का बहाना ढूंढ़ने में लगी रहती. यहां तक कि उसने अपने विश्वस्त सैनिकों और दासियों को चंद्रगुप्त की दिनचर्या पर नजर रखने के लिए लगा दिया था. इस बीच चंद्रगुप्त चाणक्य की मदद से नंद वंश का नाश करने में सफल हो गये और उन्होंने उत्तर भारत में अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया़ चंद्रगुप्त को इस बात की कोई भनक नहीं थी कि हेलेना उनसे प्यार करती है़   एक बार वह अपनी राज-व्यवस्था के सिलिसले में पाटलीपुत्र से वाहीक प्रदेश पहुंच़े  एक दिन वह अपने कुछ सैनिकों के साथ झेलम नदी के किनारे घोड़े पर बैठे घूम-फिर रहे थ़े   उन्होंने देखा कि कई सुंदर युवतियों के बीच एक युवती आराम फरमा रही है. चंद्रगुप्त को उसके बारे में जानने की इच्छा हुई़  वह अपने घोड़े से उतरकर दबे पांव आगे बढ़़े अब युवती का मुखड़ा उनके सामने था, जिसे देख कर चंद्रगुप्त को ऐसा लगा जैसे आकाश में अचानक चांदनी छिटक आयी हो़  उनका दिल हेलेन के गेसुओं में गिरफ्तार हो गया़   अब चंद्रगुप्त की दशा भी वैसी ही हो गयी, जैसी कल तक हेलेना की थी़  यह दो अजनबियों का अनोखा प्यार था़  वे मिलना तो चाहते थे, लेकिन मिलें कैसे? ऐसे में चंद्रगुप्त की मदद की उनके एक मित्र ने, जिन्होंने ऐसे कामों के लिए प्रशिक्षित रानी कबूतरी के जरिये हेलेना तक चंद्रगुप्त के प्यार का पैगाम भिजवाया़ इसमें चंद्रगुप्त ने अपना हृदय निकाल कर रख दिया था़  वह पैगाम पढ़ कर हेलेना की खुशी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. चंद्रगुप्त का रोबीला रूप उसके सामने आ गया़  इसके जवाब में हेलेना ने लिखा, मैं तो सिर्फ आपकी अमानत हूं, आइए और मुझे ले जाइए़  पर मन भय से कांपता है कि कहीं हमारा प्यार मेरे पिता को स्वीकार होगा भी या नहीं. मुझे लगता है कि मेरे पिता हमारे मिलन के लिए तैयार नहीं होंगे, पर क्या सिर्फ एक बार, हमारी मुलाकात नहीं हो सकती है? कहते हैं कि अगर किसी को सच्चे दिल से प्यार किया जाये, तो सारी कायनात उसे एक करने में जुट जाती है़  यही इन प्रेमियों के साथ हुआ़ दरअसल, बेबिलोनिया से लेकर भारत तक सेल्यूकस निकेटर के साम्राज्य के स्थानीय क्षत्नप बगावत के बिगुल बजाने लगे थे, जिससे वह परेशान था़ इस बीच हेलेना बेबिलोनिया चली गयी़  चंद्रगुप्त की तो जैसे जिंदगी चली गयी़   क्षत्रपों की बगावत कुचलने के लिए सेल्यूकस को भारत में मदद की जरूरत थी और उसकी यह जरूरत तब सिर्फ चंद्रगुप्त ही पूरी कर सकते थ़े  उसने मदद मांगी और चंद्रगुप्त ने विद्रोहियों को दबाने में उसकी मदद की़  इस एहसान तले दबे सेल्युकस ने चंद्रगुप्त से पूछा, आप मेरे योग्य कोई सेवा बतायें, मैं तन-मन-धन से उसे पूरा करने की कोशिश करूंगा़ चंद्रगुप्त ने कहा, भगवान की कृपा से मेरे पास सब कुछ है. बस केवल एक चीज नहीं है, लेकिन वह आपके पास है. अगर मैं वह मांगूं तो क्या आप दे सकते हैं. समझिए, जिंदगी का सवाल है़   सेल्यूकस ने कहा, सम्राट! अगर यह आपकी जिंदगी का सवाल है, तब तो मैं इसे मौत की कीमत पर भी आपके हवाले कर दूंगा़  चंद्रगुप्त ने बड़ी शालीनता से कहा, अगर मैं आपकी बेटी हेलेना का हाथ मांगूं तो क्या आप स्वीकार करेंगे? सेल्यूकस ने कहा, मुझे हेलेना का हाथ आपके हाथ में देने में कोई गुरेज नहीं, लेकिन उसकी रजामंदी तो जाननी होगी़   वह सोच रहा था कि उसकी बेटी किसी हिंदुस्तानी को अपने शौहर के रूप में अपनाने को शायद राजी न हो, लेकिन तब उसे आश्चर्य हुआ, जब हेलेना ने चंद्रगुप्त के साथ विवाह के प्रस्ताव को खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया़  इतिहासकार लिखते हैं कि चंद्रगुप्त भव्य बारात लेकर हेलेना से विवाह करने पहुंचा था़  |
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 विवाह के बाद चंद्रगुप्त हेलेना को लेकर पाटलीपुत्र आ गये. यही हेलेना बिंदुसार की सौतेली मां बनी़  एक तरह से चंद्रगुप्त और हेलेना की शादी यूनानी और भारतीय संस्कृति का मिलन थी और संदेश यह कि युद्ध पर प्यार भारी पड़ता है़

हेलेना ने जब चन्द्रगुप्त से शादी की थी तो वह हेलेना के प्यार में इतने खो गए कि अखण्ड भारत बनाने के सपने को भी भूल गए थे और अपना सब कुछ हेलेना पर लुटाने लगे तब चाणक्य ने उनको अखण्ड भारत का सपना दिखाया था।


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20 मार्च 2019

4:07 pm

इतिहास की सबसे खूबसूरत प्रेमिका जिसने अपने पति के लिए अपना सिर काट डाला


यह वीरगाथा राजस्थान की एक ऐसी रानी की है जिसने अपने पति को विजय की ओर प्रेरित करने के लिए एक ऐसा बलिदान दिया जिसे करना तो दूर सोचना भी शायद मुमकिन नहीं। आईये जानते हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ था, सच्ची देशभक्ति और राष्ट्र प्रेम, बलिदान की आपने कई कहानियां सुनी होंगी, लेकिन कोई अपने पति को उसका फर्ज याद दिलाने के लिए अपना मस्तक ही काटकर पेश कर दे.... ताकि वह अपनी नई-नवेली दुल्हन के मोहपाश में बंधा अपने राष्ट्र धर्म से विमुख ना हो, ऐसा करने वाली वीरांगनाओं में भी श्रेष्ठ वीरांगना ही कहलाएगी।

यह कहानी है बूंदी के हाड़ा शासक की बेटी की, जो विवाह के बाद उदयपुर (मेवाड़) के सलुम्बर के सरदार राव हाड़ी सरदार चूड़ावत की रानी बनी। बाद में इन्हें इतिहास में हाड़ी रानी के नाम से जाना गया।

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चुण्डावत मांगी सैनाणी, 
सिर काट दे दियो क्षत्राणी" 
राजस्थान में गाया जाने वाला यह गीत इस वीरांगना के अमर बलिदान को कहता है। मेवाड़ के स्वर्णिम इतिहास में हाड़ी रानी का नाम अपने स्वर्णिम बलिदान के लिए अंकित है। यह उस समय की बात है जब मेवाड़ पर महाराणा राजसिंह (1652 - 1680 ई०) का शासन था। इनके सामन्त सलुम्बर के राव चुण्डावत रतन सिंह थे। जिनसे हाल ही में हाड़ा राजपूत सरदार की बेटी से शादी हुई थी। लेकिन शादी के सात दिन बाद ही राव चुण्डावत रतन सिंह को महाराणा राजसिंह सन्देश प्राप्त हुआ था। जिसमे उन्होंने राव चुण्डावत रतन सिंह को दिल्ली से ओरंगजेब के सहायता के लिए आ रही अतिरिक्त सेना को रोकने का निर्देश दिया था। चुण्डावत रतन सिंह के लिए यह सन्देश उनका मित्र शार्दूल सिंह ले कर आया था।

यह सन्देश मिलते ही चुण्डावत रतन सिंह ने अपनी सेना को युद्ध की तैयारी का आदेश दे दिया। वह इस सन्देश को लेकर अपनी पत्नी हाड़ी रानी के पास पहुँच और सारी कह सुनाई। जिसके बाद हाड़ी रानी ने अपने पति को युद्ध में जाने के लिए तैयार किया। उनके लिए विजय की कामना के साथ उन्हें युद्ध के लिए विदाई दी।
सरदार अपनी सेना के साथ हवा से बाते करता उड़ा जा रहा था। किन्तु उसके मन में रह रह कर आ रहा था कि कही सचमुच मेरी पत्नी मुझे बिसार न दें? वह मन को समझाता पर उसक ध्यान उधर ही चला जाता। अंत में उससे रहा न गया। उसने आधे मार्ग से अपने विश्वस्त सैनिकों के रानी के पास भेजा। उसकों फिर से स्मरण कराया था कि मुझे भूलना मत। मैं जरूर लौटूंगा।
संदेश वाहक को आश्वस्त कर रानी ने लौटाया। दूसर दिन एक और वाहक आया। फिर वही बात। तीसरे दिन फिर एक आया। इस बार वह पत्नी के नाम सरदार का पत्र लाया था। प्रिय मैं यहां शत्रुओं से लोहा ले रहा हूं। अंगद के समान पैर जमाकर उनको रोक दिया है। मजाल है कि वे जरा भी आगे बढ़ जाएं। यह तो तुम्हारे रक्षा कवच का प्रताप है। पर तुम्हारे बड़ी याद आ रही है। पत्र वाहक द्वारा कोई अपनी प्रिय निशानी अवश्य भेज देना। उसे ही देखकर मैं मन को हल्का कर लिया करुंगा। हाड़ी रानी पत्र को पढ़कर सोच में पड़ गयीं। युद्धरत पति का मन यदि मेरी याद में ही रमा रहा उनके नेत्रों के सामने यदि मेरा ही मुखड़ा घूमता रहा तो वह शत्रुओं से कैसे लड़ेंगे। विजय श्री का वरण कैसे करेंगे? उसके मन में एक विचार कौंधा। वह सैनिक से बोली वीर ? मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशान दे रही हूं। इसे ले जाकर उन्हें दे देना।
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थाल में सजाकर सुंदर वस्त्र से ढककर अपने वीर सेनापति के पास पहुंचा देना। किन्तु इसे कोई और न देखे। वे ही खोल कर देखें। साथ में मेरा यह पत्र भी दे देना। हाड़ी रानी के पत्र में लिखा था प्रिय। मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशानी भेज रही हूं। तुम्हारे मोह के सभी बंधनों को काट रही हूं। अब बेफ्रिक होकर अपने कर्तव्य का पालन करें मैं तो चली... स्वर्ग में तुम्हारी बाट जोहूंगी। पलक झपकते ही हाड़ी रानी ने अपने कमर से तलवार निकाल, एक झटके में अपने सिर को उड़ा दिया। वह धरती पर लुढ़क पड़ा। सिपाही के नेत्रो से अश्रुधारा बह निकली। कर्तव्य कर्म कठोर होता है सैनिक ने स्वर्ण थाल में हाड़ी रानी के कटे सिर को सजाया। सुहाग के चूनर से उसको ढका।
भारी मन से युद्ध भूमि की ओर दौड़ पड़ा। उसको देखकर हाड़ा सरदार स्तब्ध रह गया उसे समझ में न आया कि उसके नेत्रों से अश्रुधारा क्यों बह रही है? धीरे से वह बोला क्यों यदुसिंह। रानी की निशानी ले आए? यदु ने कांपते हाथों से थाल उसकी ओर बढ़ा दिया। हाड़ा सरदार फटी आंखों से पत्नी का सिर देखता रह गया। उसके मुख से केवल इतना निकला उफ् हाय रानी। तुमने यह क्या कर डाला। संदेही पति को इतनी बड़ी सजा दे डाली खैर। मैं भी तुमसे मिलने आ रहा हूं।
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हाड़ा सरदार के मोह के सारे बंधन टूट चुके थे। वह शत्रु पर टूट पड़ा। इतना अप्रतिम शौर्य दिखाया था कि उसकी मिसाल मिलना बड़ा कठिन है। जीवन की आखिरी सांस तक वह लंड़ता रहा। औरंगजेब की सहायक सेना को उसने आगे नहीं ही बढऩे दिया, जब तक मुगल बादशाह मैदान छोड़कर भाग नहीं गया था।
इस विजय का श्रेय आज भी राजस्थान के अंचलो में हाड़ी रानी को उनके अमर बलिदान की यशोगाथाओ में दिया जाता है। जिसके चलते इसी वीरांगना के नाम पर राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान पुलिस में एक महिला बटालियन का गठन किया गया। गठन के बाद इस महिला बटालियन का नामकरण इसी वीरांगना के नाम पर हाड़ी रानी महिला बटालियन रखा गया है।

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9:52 am

इतिहास की एक ऐसी रानी जो पहले बनाती हवस का शिकार और बाद में जिंदा जला देती थी

नमस्कार दोस्तों आप लोगों का इस चैनल पर स्वागत है। इतिहास दुनिया में बहुत सारे ऐसे महान राजा और रानी हुए जिनका नाम आज भी लोग गर्व से लेते है। आप लोगों ने इतिहास के कई राजा के बारे में सुना होगा जो अपने क्रूर और दयालु स्वभाव के कारण जाने जाते है। लेकीन आज हम आपको किसी राजा के बारे में नही बल्कि एक बहुत ही खतरनाक और बुद्धीमान रानी के बारे में बताने जा रहे है जिसके कारनामे जानकर आप भी हैरान हो जाएंगे।
रानी एनजिंगा एमबांदी

दोस्तों हम जिस रानी की बात कर रहे है उसे एनजिंगा एमबांदे है। आपको बता दें इस रानी के बारे में कहा जाता है कि इस रानी के पास बहुत तेज दिमाग था। जिसके कारण कोई भी राजा या अन्य लोग इस रानी को परास्त नही कर पाते थे। इस रानी ने राज्य के लालच में अपने भाईयों को भी मरवा दिया था। इस रानी ने अपने शासन काल में बहुत से लोगों को मौत के घाट उतार दिया था।

इतिहास की किताबों में झांकें तो अफ्रीकी देश अंगोला की रानी एनजिंगा एमबांदी एक बहादुर और तेज दिमाग वाली योद्धा के रूप में नजर आएंगी, जिन्होंने 17वीं शताब्दी में अफ्रीका में यूरोपीय उपनिवेशवाद के खिलाफ जंग छेड़ी थी।
लेकिन कुछ लोग उन्हें एक क्रूर महिला के रूप में भी देखते हैं, जिन्होंने सत्ता के लिए अपने भाई को भी मौत के घाट उतार दिया। यहीं, नहीं वह अपने हरम में रहने वाले पुरुषों के साथ एक बार यौन संबंध बनाने के बाद उन्हें जिंदा जलवा देती थीं, लेकिन इतिहासकार एक बात पर राजी होते हैं और वह यह है कि एनिजिंगा अफ्रीका की सबसे लोकप्रिय महिलाओं में से एक हैं।
रानी या एनगोला 
एमबांदू लोगों की नेता एनजिंगा दक्षिण पश्चिम अफ्रीकी देश एनदोंगो और मतांबा की रानी थीं। लेकिन स्थानीय भाषा किमबांदु में एनजिंगा को एनगोला कहा जाता था और यही वो शब्द था जिससे पुर्तगाली लोग इस शब्द को बुलाया करते थे, और ये आखिरकार इस क्षेत्र को अंगोला कहा जाने लगा। इस इलाके को ये नाम तब मिला जब पुर्तगाल के सैनिकों ने सोने और चांदी की तलाश में एनदोंगो पर हमला किया था।


पुर्तगाल के खिलाफ समझौतों की राजनीति 
इसके बाद राजा एनगोला एमबांदी ने अपनी बहन के साथ सत्ता को बांटने का फैसला किया। पुर्तगाली मिशनरियों से पुर्तगाली भाषा सीखने वाली एनजिंगा एक बेहद प्रतिभाशाली रणनीतिकार थीं। ऐसे में जब एनजिंगा बातचीत का दौर शुरू करने के लिए लुआंडा पहुंची तो उन्होंने वहां पर काले, गोरे और कई संकर जातियों के लोगों को देखा। एनजिंगा ने ऐसा नजारा पहली बार देखा था लेकिन वो इसकी जगह किसी और चीज को देखकर आश्चर्यचकित रह गईं।

दरअसल, गुलामों को एक पंक्ति में खड़ा करके बड़े-बड़े जहाजों में ले जाया जा रहा था। कुछ ही सालों में लुआंडा अफ्रीका में सबसे बड़ा गुलामों का अड्डा बन गया, लेकिन जब वह पुर्तगाली गवर्नर जोआओ कोरिए डे सोउसा के साथ शांति वार्ता करने उनके दफ्तर पहुंची तो एनजिंगा के साथ जो व्यवहार किया गया उस पर इतिहासकारों ने टिप्पणियां की हैं, क्योंकि जब वह वहां पहुंची तो उन्होंने देखा कि पुर्तगाली आरामदायक कुर्सियों पर बैठे हुए हैं और उनके लिए जमीन पर बैठने की व्यवस्था की गई थी।
ये देखकर निजिंगा ने एक भी शब्द नहीं कहा और उनकी नजर के इशारे को देखते ही उनका एक नौकर कुर्सी के अंदाज में एनजिंगा के सामने बैठ गया, फिर निजिंगा उसकी पीठ पर बैठ गया और वह गवर्नर के बराबर ऊंचाई पर पहुंच गईं। एनजिंगा ने इस तरह ये बता दिया कि वह बराबरी के स्तर से बातचीत करने आई हैं। बातचीत के लंबे दौर के बाद दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हो गए कि पुर्तगाली सेना एनदोंगो को छोड़कर चली जाएंगी और उनकी संप्रभुता को स्वीकार करेंगी।
लेकिन इसके बदले में एनजिंगा इस पर तैयार हुईं कि इस क्षेत्र को व्यापारिक रास्तों को बनाने के लिए खुला छोड़ा जाएगा। पुर्तगाल के साथ रिश्ते बेहतर करने के लिए एनजिंगा ने ईसाई धर्म भी स्वीकार किया जिसके बाद नया नाम एना डे सूजा धारण किया गया। इस वक्त उनकी उम्र 40 साल थी, लेकिन दोनों के बीच बेहतर रिश्ते ज्यादा देर तक नहीं चले और जल्द ही संघर्ष की शुरुआत हो गई।

जब एनजिंगा बनी रानी 
साल 1624 में इनके भाई एक छोटे से द्वीप में जाकर रहने लगे। इसके बाद यहीं उनकी मौत हो गई। एनजिंगा की भाई की मौत को लेकर कई तरह की कहानियां हैं। कुछ लोग कहते हैं कि एनजिंगा ने अपने बेटे की हत्या का बदला लेने के लिए उन्हें जहर दिलवाया। वहीं, कुछ लोग उनकी मौत को आत्महत्या के रूप में भी देखते हैं। लेकिन इस सबके बीच में एमजिंगा एमबांदे ने पुर्तागालियों और कुछ अपने लोगों की चुनौतियों का सामना करते हुए एनदोंगों की पहली रानी बनने का कीर्तिमान बनाकर दिखाया।

अंगोला की नेशनल लाइब्रेरी के निदेशक जाओ पेड्रो लॉरेंको के मुताबिक, अफ्रीका में बीते कई युगों से जारी महिलाओं के शोषण के खिलाफ एनजिंगा एमबांदे एक मुखर आवाज की तरह हैं।" वह कहते हैं, "उनकी तरह ही कई और हस्तियां हैं जो हमें ये समझने में मदद करते हैं कि अफ्रीका में सत्ता के ढांचे में फिट रहने के बावजूद महिलाओं ने इस महाद्वीप के विकास में योगदान दिया है।"
कुछ सूत्र कहते हैं कि एनजिंगा का अंदाज एक रानी के मुताबिक क्रूरता से भरा था। उदाहरण के लिए, इमबांगाला योद्धाओं की मदद लेना जो राज्य की सीमा पर रहते थे ताकि अपने प्रतिद्वंद्वियों को डराकर अपनी स्थिति को मजबूत किया जा सके। कई सालों तक अपने राज्य का नेतृत्व करने के बाद एनजिंगा ने अपने पड़ोसी राज्य मुतांबा पर अधिकार कर लिया। इसके साथ ही अपनी सीमाओं की भी ढंग से हिफाजत की।
ब्राजीली और पुर्तगाली लेखिका जोस एडुआर्डो अगुआलुसा कहते हैं, "क्वीन एनजिंगा युद्ध भूमि में एक महान योद्धा ही नहीं बल्कि एक महान रणनीतिक और राजनयिक थे।" "वह पुर्तगालियों के खिलाफ लड़ी और डचों के साथ दोस्ती की। वहीं, जब दूसरे राज्यों से संघर्ष होता था तो वह पुर्तगालियों से मदद ले लेती थीं।"
इतिहास की एक ऐसी रानी जो पहले बनाती हवस का शिकार और बाद में जिंदा जला देती थी


सेक्स स्लेव से जुड़ी कहानी 
फ्रांसीसी दार्शनिक मार्किस दे सादे ने इतालवी मिशनरी गिओवनी कावेजी की कहानियों पर आधारित एक किताब 'द फिलॉसोफी ऑफ द ड्रेसिंग टेबल' लिखी है। कावेजी ने दावा किया था कि एनजिंगा अपने आशिकों को साथ सेक्स करने के बाद जलाकर मार देती थी।

रानी एनजिंगा के हरम को चिबदोस कहा जाता था और इसमें रहने वाले पुरुषों को पहनने के लिए महिलाओं के कपड़े दिए जाते थे। यही नहीं, जब रानी को अपने हरम में मौजूद किसी पुरुष के साथ सेक्स करना होता था तो हरम के लड़कों को आपस में मौत होने तक लड़ना होता था।
लेकिन जीतने वाले को जो मिलता था वो और भी ज्यादा खतरनाक होता था। दरअसल, ये होता था कि इन पुरुषों को सेक्स के बाद जलाकर मार दिया जाता था। हालांकि, ये माना जाता है कि कावेजी की कहानियां दूसरे लोगों के दावों पर आधारित हैं। ऐसे में इतिहासकार मानते हैं कि इसके कई और वर्जन भी मौजूद हैं।
9:02 am

तीन एसे शासक जिनकी मोहब्बत उनकी दुश्मन बन गई।

ऐसा कहा जाता है, कि कुछ लोग इश्क करके बन जाते हैं और कुछ लोग फना हो जाते हैं। आज हम इस पोस्ट में ऐसे तीन राजा के बारे में बताने जा रहे है, जिनको इश्क ने बर्बाद कर दिया।

शाहजहां और मुमताज

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शाहजहां और मुमताज की प्रेम कहानी सबको पता है। जिसकी चर्चा पूरे संसार में होती है। लोग इसे मोहब्बत की निशानी मानते हैं। इसको शाहजहां ने मुमताज की याद में बनवाया था। मुगल समय के खजाने को शाहजहां ताजमहल बनवाने में लगा रहे हैं। जिसे देखकर औरंगज़ेब प्रसन्न नहीं थे। इसी वजह से औरंगजेब ने शाहजहां को कैद खाने में डलवा दिया। जिससे वह बीमारी से पीड़ित हो गए और उनकी मृत्यु हो गई।

बाजीराव मस्तानी

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बाजीराव एक मराठा ब्राह्मण थे, परंतु वह एक ऐसी स्त्री के मोहब्बत में पड़ गए थे, जो एक मुस्लिम थी, परंतु यह मराठा समाज को कतई पसंद नहीं था, लेकिन बाजीराव बिल्कुल भी मस्तानी को छोड़ना नहीं चाहता था। शाहजहां के जैसे बाजीराव मस्तानी के लिए एक शानदार महल बनवाया था। कहा जाता है, कि जब बाजीराव कहीं लड़ाई के लिए गए थे। उसी समय बाजीराव के घर वालों ने मस्तानी को जेल में डाल दिया था।

पृथ्वीराज चौहान

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पृथ्वीराज चौहान बहुत ही पराक्रमी योद्धा थे, ये सभी जानते हैं कि पृथ्वीराज चौहान एक वीर योद्धा थे लेकिन ये बहुत कम ही लोगों को पता है कि वो एक प्रेमी भी थे। वो कन्नौज के महाराज जय चन्द्र की पुत्री संयोगिता से प्रेम करते थे। दोनों में प्रेम इतना था कि राजकुमारी को पाने के लिए पृथ्वीराज चौहान स्वयंवर के बीच से उनका अपरहण कर लाए थे।स्वयंवर से राजकुमारी के उठाने के बाद पृथ्वीराज दिल्ली के लिये रवाना हो गए। आगे जयचंद्र ने पृथ्वीराज से बदला लेने के उद्देश्य से मोहम्मद गौरी से मित्रता की और दिल्ली पर आक्रमण कर दिया। पृथ्वीराज ने मोहम्मद गौरी को 16 बार परास्त किया लेकिन पृथ्वीराज चौहान ने सहर्दयता का परिचय देते हुए मोहम्मद गौरी को हर बार जीवित छोड़ दिया। राजा जयचन्द ने गद्दारी करते हुए मोहम्मद गोरी को सैन्य मदद दी और इसी वजह से मोहम्मद गौरी की ताकत दोगुनी हो गयी तथा 17वी बार के युद्ध मे पृथ्वीराज चौहान मोहम्मद गोरी से द्वारा पराजित होने पर पृथ्वीराज चौहान को मोहम्मद गोरी के सैनिको द्वारा उन्‍हें बंदी बना लिया गया एवं उनकी आंखें गरम सलाखों से जला दी गईं। इसके साथ अलग-अलग तरह की यातनाए भी दी गई।  लेकिन इनकी मृत्यु राजा जयचंद की बेटी से इश्क करने की वजह से हुई थी।

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17 मार्च 2019

6:45 pm

क्या पाकिस्तान में आज भी मौजूद है वह खंबा जिससे प्रह्लाद को बांधा गया था

भारत की होली के पौराणिक सबूत
पाकिस्तान में
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होली शायद दुनिया का एकमात्र ऐसा त्योहार है, जो सामुदायिक बहुलता की समरस्ता से जुड़ा हुआ है। इस पर्व में मेल-मिलाप का जो आत्मीय भाव अंतरमन से उमड़ता है, वह सांप्रदायिक अतिवाद और जातीय जड़ता को भी ध्वस्त करता है। होली का त्योहार हिरण्यकश्यपु की बहन होलिका के दहन की घटना से जुड़ा है। ऐसी लोक-प्रचलित मान्यता है कि होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। वस्तुत: उसके पास ऐसी कोई वैज्ञानिक तकनीक थी जिसे प्रयोग में लाकर वह अग्नि में प्रवेश करने के बावजूद नहीं जलती थी।

चूंकि होली को बुराई पर अच्‍छाई की जीत के पर्व का पर्व माना जाता है इसलिए जब वह अपने भतीजे और विष्णु-भक्त प्रहलाद को विकृत और क्रूर मानसिकता के चलते गोद में लेकर प्रज्वलित आग में प्रविष्ट हुई तो खुद तो जलकर खाक हो गई, परंतु प्रह्लाद
बच गए। उसे मिला वरदान सार्थक सिद्ध नहीं हुआ, क्योंकि वह तो असत्य और अनाचार की आसुरी शक्ति में बदल गई थी।
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पौराणिक राज छुपे हैं पाकिस्तान में : ऐतिहासिक और पौराणिक साक्ष्‍यों से यह पता चलता है कि होली की इस गाथा के प्रामाणिक तथ्य पाकिस्तान के मुल्तान से जुड़े हैं यानी अविभाजित भारत से। अभी वहां भक्त प्रह्लाद से जुड़े मंदिर के भग्नावशेष मौजूद हैं। वह खंभा भी मौजूद है जिससे भक्त प्रह्लाद को बांधा गया था।

भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान में हिन्दुओं के मंदिरों को नेस्तनाबूद करने का जो सिलसिला चला, उसके थपेड़ों से यह मंदिर भी लगभग नष्टप्राय: हो गया, मगर इसके चंद अवशेष अब भी मुल्तान में मौजूद हैं और वहां के अल्पसंख्‍यक हिन्दू होली के उत्सव को मनाते हैं। जाहिर है, यह पर्व पाक जैसे अतिवादी से ग्रस्त देश में भी सांप्रदायिक सद्भाव का वातावरण बनाता है।


यहां वह स्थान आज भी है जहां पर भक्त प्रह्लाद को बांधा गया था और जहां से साक्षात नृसिंह देवता प्रकट हुए थे। कुछ लोग इस खंबे को भक्त प्रह्लाद के बंधे होने की मान्यता को मानते हैं जबकि कुछ यह मानते हैं कि इसी से नृसिंह देवता प्रकट हुए थे। 



प्रह्लाद की जन्मभूमि मुल्तान का इतिहास :
यह कभी प्रह्लाद की राजधानी था और उन्होंने ही यहां भगवान विष्णु का भव्य मंदिर बनवाया। मुल्तान वास्तव में संस्कृत के शब्द मूलस्थान का परिवर्तित रूप है, वह सामरिक स्थान जो दक्षिण एशिया व इरान की सीमा के चलते सैन्य दृष्टि से संवेदनशील था।

यहां माली वंश के लोगों ने भी शासन किया और अलक्षेंद्र (सिकंदर) को यहीं पर भारतीय राजाओं के साथ युद्ध के दौरान छाती में तीर लगा जो उसकी मृत्यु का कारण बना। समय-समय पर इस नगरी पर अनेक हमलावरों ने आक्रमण किए। इस्लामिक लुटेरों ने प्रह्लाद के मंदिर को भी कई बार क्षतिग्रस्त किया और इसके पास भी हजरत बहाउद्दीन जकारिया का मकबरा बना दिया गया। इतिहासकार डॉ. ए.एन. खान के हिसाब से जब ये इलाका दोबारा सिक्खों के अधिकार में आया तो सिख शासकों ने 1810 के दशक में फिर से मंदिर बनवाया।
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मगर जब एलेग्जेंडर बर्निस इस इलाके में 1831 में आये तो उन्होंने वर्णन किया कि ये मंदिर फिर से टूटे फूटे हाल में है और इसकी छत नहीं है। कुछ साल बाद जब 1849 में अंग्रेजों ने मूल राज पर आक्रमण किया तो ब्रिटिश गोला किले के बारूद के भण्डार पर जा गिरा और पूरा किला बुरी तरह नष्ट हो गया था। बहाउद्दीन जकारिया और उसके बेटों के मकबरे और मंदिर के अलावा लगभग सब जल गया था।

एलेग्जेंडर कनिंघम ने 1853 में इस मंदिर के बारे में लिखा कि ये एक ईंटों के चबूतरे पर काफी नक्काशीदार लकड़ी के खम्भों वाला मंदिर था। इसके बाद महंत बावलराम दास ने जनता से जुटाए 11,000 रुपये से इसे 1861 में फिर से बनवाया। उसके बाद 1872 में प्रह्लादपुरी के महंत ने ठाकुर फतेह चंद टकसालिया और मुल्तान के अन्य हिन्दुओं की मदद से फिर से बनवाया।

सन 1881 में इसके गुम्बद और बगल के मस्जिद के गुम्बद की उंचाई को लेकर हिन्दुओं-मुसलमानों में विवाद हुआ जिसके बाद दंगे भड़क उठे। मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में दंगे रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कुछ नहीं किया। इस तरह इलाके के 22 मंदिर उस दंगे की भेंट चढ़ गए। मगर मुल्तान के हिन्दुओं ने ये मंदिर फिर से बनवा दिया। ऐसा ही 1947 तक चलता रहा जब इस्लाम के नाम पर बंटवारे में पाकिस्तान हथियाए जाने के बाद ज्यादातर हिन्दुओं को वहां से भागना पड़ा।
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बाबा नारायण दास बत्रा वहां से आते समय वहां के भगवान नरसिंह की प्रतिमा ले आये। अब वो प्रतिमा हरिद्वार में है। टूटी फूटी, जीर्णावस्था में मंदिर वहां बचा है। सन 1992 के दंगे में ये मंदिर पूरी तरह तोड़ दिया गया। अब वहां मंदिर का सिर्फ अवशेष बचा है। सन 2006 में बहाउद्दीन जकारिया के उर्स के मौके पर सरकार ने इस मंदिर के अवशेष में वजू की जगह बनाने की इजाजत दे दी।
12:34 pm

Holi ka mahotsav ka itihas or mahatva || होली महोत्सव का इतिहास और महत्व ||


होली का त्यौहार अपनी सांस्कृतिक और पारंपरिक मान्यताओं की वजह से बहुत प्राचीन समय से मनाया जा रहा है। इसका उल्लेख भारत की पवित्र पुस्तकों,जैसे पुराण, दसकुमार चरित, संस्कृत नाटक, रत्नावली और भी बहुत सारी पुस्तकों में किया गया है। होली के इस अनुष्ठान पर लोग सड़कों, पार्कों, सामुदायिक केंद्र, और मंदिरों के आस-पास के क्षेत्रों में होलिका दहन की रस्म के लिए लकड़ी और अन्य ज्वलनशील सामग्री के ढेर बनाने शुरू कर देते है। लोग घर पर साफ- सफाई, धुलाई, गुझिया, मिठाई, मठ्ठी, मालपुआ, चिप्स आदि और बहुत सारी चीजों की तैयारी शुरू कर देते है। होली पूरे भारत में हिंदुओं के लिए एक बहुत बड़ा त्यौहार है, जो ईसा मसीह से भी पहले कई सदियों से मौजूद है। इससे पहले होली का त्यौहार विवाहित महिलाओं द्वारा पूर्णिमा की पूजा द्वारा उनके परिवार के अच्छे के लिये मनाया जाता था। प्राचीन भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस त्यौहार का जश्न मनाने के पीछे कई किंवदंतियों रही हैं।

होली हिंदुओं के लिए एक सांस्कृतिक, धार्मिक और पारंपरिक त्यौहार है। होली शब्द "होलिका" से उत्पन्न है। होली का त्यौहार विशेष रूप से भारत के लोगों द्वारा मनाया जाता है जिसके पीछे बड़ा कारण है।

होली के क्षेत्र वार उत्सव के अनुसार, इस त्यौहार के अपने स्वयं के पौराणिक महत्व है, जिसमें सांस्कृतिक, धार्मिक और जैविक महत्व शामिल है। होली महोत्सव का पौराणिक महत्व ऐतिहासिक किंवदंतियों के अंतर्गत आता है जो इस त्यौहार के साथ जुड़ी है।
भक्त प्रहलाद और होलिका दहन

पौराणिक महत्व
होली उत्सव का पहला पौराणिक महत्व प्रहलाद, होलिका और हिरण्याकश्यप की कथा है। बहुत समय पहले, हिरण्याकश्यप नामक एक राक्षस राजा था। उसकी बहन का नाम होलिका था और पुत्र प्रह्लाद था। बहुत वर्षों तक तप करने के बाद, उसे भगवान ब्रह्मा द्वारा पृथ्वी पर शक्तिशाली आदमी होने का वरदान प्राप्त हुआ। उन शक्तियों ने उसे अंहकारी बना दिया, उसे लगा कि केवल वह ही अलौकिक शक्तियों वाला भगवान है। वह तो उसने हर किसी से खुद को भगवान के रूप में उसे पूजा करने की मांग शुरू कर दी।
लोग बहुत कमजोर और डरे हुए थे और बहुत आसानी से उसका अनुकरण करना शुरू कर दिया, हालांकि, उसका बेटा जिसका नाम प्रहलाद था, अपने ही पिता के फैसले से असहमत था। प्रहलाद बचपन से ही बहुत धार्मिक व्यक्ति था, और हमेशा भगवान विष्णु को समर्पित रहता था। प्रहलाद का इस तरह के व्यवहार उसके पिता, हिरणयाकश्प को बिल्कुल पसन्द नहीं था। उसने प्रलाद को कभी अपना पुत्र नही माना और उसे क्रूरता से दण्ड देना शुरु कर दिया। हालांकि, प्रहलाद हर बार आश्चर्यजनक रुप से कुछ प्राकृतिक शक्तियों द्वारा बचाया गया।
अंत में, वह अपने बेटे के साथ तंग आ गया और कुछ मदद पाने के लिए अपनी बहन होलिका को बुलाया। उसने अपने भतीजे को गोद में रख कर आग में बैठने की एक योजना बनाई, क्योंकि उसे आग से कभी भी नुकसान न होने का वरदान प्राप्त था। उसने आग से रक्षा करने के लिए एक विशेष शाल में खुद को लपेटा और प्रहलाद के साथ विशाल आग में बैठ गयी। कुछ समय के बाद जब आग बडी और भयानक हुई उसकी शाल प्रहलाद को लपेटने के लिए दूर उडी। वह जल गयी और प्रहलाद को उसके भगवान विष्णु द्वारा बचा लिया गया। हिरण्याकश्प बहुत गुस्से में था और अपने बेटे को मारने के लिए एक और चाल सोचना शुरू कर दिया।वह दिन जब प्रहलाद को बचाया गया था होलिका दहन और होली को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक के रूप में मनाना शुरू कर दिया।
होली महोत्सव का एक अन्य पौराणिक महत्व राधा और कृष्ण की कथा है। ब्रज क्षेत्र में होली के त्यौहार को मनाने के पीछे राधा और कृष्ण का दिव्य प्रेम है। ब्रज में लोग होली दिव्य प्रेम के उपलक्ष्य में को प्यार के एक त्योहार के रूप में मनाते हैं। इस दिन, लोग गहरे नीले रंग की त्वचा वाले छोटे कृष्ण को और गोरी त्वचा वाली राधा को गोपियों सहित चरित्रों को सजाते है। भगवान कृष्ण और अन्य गोपियों के चहरे पर रंग लगाने जाते थे।
दक्षिणी भारतीय क्षेत्रों में होली के अन्य किंवदंती, भगवान शिव और कामदेव की कथा है। लोग होली का त्यौहार पूरी दुनिया को बचाने के लिये भगवान शिव के ध्यान भंग करने के भगवान कामदेव के बलिदान के उपलक्ष्य में मनाते है।
होली का त्यौहार मनाने के पीछे ऑगरेस धुंन्धी की गाथा प्रचलित है। रघु के साम्राज्य में ऑगरेस धुंन्धी बच्चों को परेशान करता था। होली के दिन वह बच्चों के गुर से खुद दूर भाग गया।


सांस्कृतिक महत्व
होली महोत्सव मनाने के पीछे लोगों की एक मजबूत सांस्कृतिक धारणा है। इस त्योहार का जश्न मनाने के पीछे विविध गाथाऍ लोगों का बुराई पर सच्चाई की शक्ति की जीत पर पूर्ण विश्वास है। लोग को विश्वास है कि परमात्मा हमेशा अपने प्रियजनों और सच्चे भक्तो को अपने बङे हाथो में रखते है। वे उन्हें बुरी शक्तियों से कभी भी हानि नहीं पहुँचने देते। यहां तक कि लोगों को अपने सभी पापों और समस्याओं को जलाने के लिए होलिका दहन के दौरान होलिका की पूजा करते हैं और बदले में बहुत खुशी और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं। होली महोत्सव मनाने के पीछे एक और सांस्कृतिक धारणा है, जब लोग अपने घर के लिए खेतों से नई फसल लाते है तो अपनी खुशी और आनन्द को व्यक्त करने के लिए होली का त्यौहार मनाते हैं।

सामाजिक महत्व
होली के त्यौहार का अपने आप में सामाजिक महत्व है, यह समाज में रहने वाले लोगों के लिए बहुत खुशी लाता है। यह सभी समस्याओं को दूर करके लोगों को बहुत करीब लाता है उनके बंधन को मजबूती प्रदान करता है। यह त्यौहार दुश्मनों को आजीवन दोस्तों के रूप में बदलता है साथ ही उम्र, जाति और धर्म के सभी भेदभावो को हटा देता है। एक दूसरे के लिए अपने प्यार और स्नेह दिखाने के लिए, वे अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए उपहार, मिठाई और बधाई कार्ड देते है। यह त्यौहार संबंधों को पुन: जीवित करने और मजबूती के टॉनिक के रूप में कार्य करता है, जो एक दूसरे को महान भावनात्मक बंधन में बांधता है।

जैविक महत्व
होली का त्यौहार अपने आप में स्वप्रमाणित जैविक महत्व रखता है। यह हमारे शरीर और मन पर बहुत लाभकारी प्रभाव डालता है, यह बहुत आनन्द और मस्ती लाता है। होली उत्सव का समय वैज्ञानिक रूप से सही होने का अनुमान है।

यह गर्मी के मौसम की शुरुआत और सर्दियों के मौसम के अंत में मनाया जाता है जब लोग स्वाभाविक रूप से आलसी और थका हुआ महसूस करते है। तो, इस समय होली शरीर की शिथिलता को प्रतिक्रिया करने के लिए बहुत सी गतिविधियॉ और खुशी लाती है। यह रंग खेलने, स्वादिष्ट व्यंजन खाने और परिवार के बड़ों से आशीर्वाद लेने से शरीर को बेहतर महसूस कराती है।

होली के त्यौहार पर होलिका दहन की परंपरा है। वैज्ञानिक रूप से यह वातावरण को सुरक्षित और स्वच्छ बनाती है क्योंकि सर्दियॉ और वसंत का मौसम के बैक्टीरियाओं के विकास के लिए आवश्यक वातावरण प्रदान करता है। पूरे देश में समाज के विभिन्न स्थानों पर होलिका दहन की प्रक्रिया से वातावरण का तापमान 145 डिग्री फारेनहाइट तक बढ़ जाता है जो बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक कीटों को मारता है।

उसी समय लोग होलिका के चारों ओर एक घेरा बनाते है जो परिक्रमा के रूप में जाना जाता है जिस से उनके शरीर के बैक्टीरिया को मारने में मदद करता है। पूरी तरह से होलिका के जल जाने के बाद, लोग चंदन और नए आम के पत्तों को उसकी राख(जो भी विभूति के रूप में कहा जाता है) के साथ मिश्रण को अपने माथे पर लगाते है,जो उनके स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में मदद करता है। इस पर्व पर रंग से खेलने के भी स्वयं के लाभ और महत्व है। यह शरीर और मन की स्वास्थता को बढ़ाता है। घर के वातावरण में कुछ सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह करने और साथ ही मकड़ियों, मच्छरों को या दूसरों को कीड़ों से छुटकारा पाने के लिए घरों को साफ और स्वच्छ में बनाने की एक परंपरा है।

22 फ़रवरी 2019

9:03 am

सिकंदर को कांटे की टक्कर देने वाले राजा पोरस कौन थे

इतिहास में पोरस और सिकंदर की लड़ाई काफ़ी चर्चित है. पोरस और सिकंदर के युद्ध और उनकी दोस्ती के क़िस्से भी ख़ूब सुनाए जाते हैं. पोरस कौन थे और सिकंदर से उनकी दोस्ती किन वजहों से हुई उसके पीछे इतिहासकार कूटनीति की तरफ़ इशारा करते हैं.
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पंजाब में झेलम से लेकर चेनाब नदी तक राजा पोरस या पुरुवास का राज्य था. इसकी राजधानी मौजूदा लाहौर के आस-पास थी. राजा पोरस पोरवा के वशंज थे.
उनका साम्राज्य वर्तमान पंजाब में झेलम और चेनाब नदियों तक (ग्रीक में हाइडस्पेश और एसीसेंस) था. पोरस का कार्यकाल 340 ईसा पूर्व से 315 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है.

सिकंदर से टकराव क्यों हुआ?

इतिहासकार बताते हैं कि सिकंदर विश्व विजय पर निकले हुए थे. वो पोरस के राज्य तक पहुंच गए थे. सिकंदर के आगे जिसने सरेंडर नहीं किया, उनसे टकराव हुआ.
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में प्राचीन इतिहास के प्रोफेसर डीपी दुबे कहते हैं, ''326 ईसा पूर्व में सिकंदर और पोरस के बीच लड़ाई हुई थी.''
तक्षशिला के राजा ने सिकंदर के आगे घुटने टेक दिए और सिकंदर से पोरस पर आक्रमण करने के लिए कहा ताकि उनका राज्य विस्तार हो सके.
लेकिन पोरस ने वीरता के साथ लड़ाई लड़ी और काफ़ी संघर्ष के बाद पराजय हुई. इसमें सिकंदर की सेना को भी भारी नुक़सान पहुंचा.
इतिहास में मिले आंकड़ों के मुताबिक़, सिकंदर की सेना में 50 हज़ार से भी अधिक सैनिक थे जबकि पोरस के सैनिकों की संख्या 20 हज़ार के क़रीब थी. पोरस ने सिकंदर की सेना के सामने अपनी सेना के हाथी खड़े कर दिये, जिससे सिकंदर भी दंग थे.
हालांकि प्रो. दुबे यह भी मानते हैं कि सिकंदर का आक्रमण कभी भारत में हुआ ही नहीं. वो कहते हैं, ''मेरे हिसाब से सिकंदर का आक्रमण पाकिस्तान में हुआ था. सिकंदर की हिम्मत कभी सिंध नदी पार करने की नहीं हुई.''

सिकंदर और पोरस की दोस्ती कैसे हुई?

 जब पोरस हार गए तब उन्हें सिकंदर के सामने पेश किया गया. सिकंदर ने पोरस से सवाल किया कि उनके साथ कैसा बर्ताव किया जाए? इस सवाल के जवाब में पोरस ने सिकंदर से बड़े आत्मविश्वास और आत्मसम्मान के साथ कहा कि ठीक वैसा, जैसा एक शासक दूसरे शासक के साथ करता है.
सिकंदर को उनका आत्मविश्वास से भरा जवाब पसंद आया और उसके बाद सिकंदर को महसूस हुआ कि उनकी सेना को यहां काफ़ी संघर्ष करना पड़ा है और नुक़सान झेलना पड़ा है.
इस तरह के नुक़सान और टकराव से बचने के लिए सिकंदर ने पोरस से दोस्ताना संबंध स्थापित किए ताकि आगे किसी तरह की मदद के लिए पोरस का साथ हासिल किया जा सके.

पोरस का अंत

 पोरस से संधि के बाद सिकंदर जनरल नियाज़ को ज़िम्मेदारी सौंप कर अपने प्रदेश की तरफ़ लौटने लगे, लेकिन रास्ते में उनका स्वास्थ्य बिगड़ा और उनकी मृत्यु हो गई.''
इतिहास में यह भी दावा किया जाता है कि 323 ईसा पूर्व में सिकंदर की मौत के बाद उनके ही एक जनरल ने पोरस की हत्या करवा दी.
हालांकि पोरस की मौत को लेकर सटीक तौर पर कोई तिथि या अन्य जानकारी नहीं मिलती. ऐसा माना जाता है कि पोरस की मृत्यु 321 से 315 ईसा पूर्व के बीच हुई.

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19 फ़रवरी 2019

8:51 pm

सोमनाथ मन्दिर भारत के गुजरात राज्य का एक नगर

सोमनाथ मन्दिर   भारत के पश्चिमी छोर पर गुजरात राज्य में स्थित, अत्यन्त प्राचीन व ऐतिहासिक सूर्य मन्दिर है। यह भारतीय इतिहास तथा हिन्दुओं के चुनिन्दा और महत्वपूर्ण मन्दिरों में से एक है। इसे आज भी भारत के १२ ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में माना व जाना जाता है। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में स्पष्ट है।
सोमनाथ मन्दिर

      यह मन्दिर हिंदू धर्म के उत्थान-पतन के इतिहास का प्रतीक रहा है। अत्यंत वैभवशाली होने के कारण इतिहास में कई बार यह मंदिर तोड़ा तथा पुनर्निर्मित किया गया। वर्तमान भवन के पुनर्निर्माण का आरंभ भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने करवाया और पहली दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया। सोमनाथ मंदिर विश्व प्रसिद्ध धार्मिक व पर्यटन स्थल है। मंदिर प्रांगण में रात साढ़े सात से साढ़े आठ बजे तक एक घंटे का साउंड एंड लाइट शो चलता है, जिसमें सोमनाथ मंदिर के इतिहास का बड़ा ही सुंदर सचित्र वर्णन किया जाता है। लोककथाओं के अनुसार यहीं श्रीकृष्ण ने देहत्याग किया था। इस कारण इस क्षेत्र का और भी महत्व बढ़ गया।
         सोमनाथजी के मंदिर की व्यवस्था और संचालन का कार्य सोमनाथ ट्रस्ट के अधीन है। सरकार ने ट्रस्ट को जमीन, बाग-बगीचे देकर आय का प्रबन्ध किया है। यह तीर्थ पितृगणों के श्राद्ध, नारायण बलि आदि कर्मो के लिए भी प्रसिद्ध है। चैत्र, भाद्रपद, कार्तिक माह में यहां श्राद्ध करने का विशेष महत्व बताया गया है। इन तीन महीनों में यहां श्रद्धालुओं की बडी भीड़ लगती है। इसके अलावा यहां तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती का महासंगम होता है। इस त्रिवेणी स्नान का विशेष महत्व है।

प्राचीन हिन्दू ग्रंथों के अनुसार में बताये कथानक के अनुसार सोम अर्थात् चन्द्र ने, दक्षप्रजापति राजा की २७ कन्याओं से विवाह किया था। लेकिन उनमें से रोहिणी नामक अपनी पत्नी को अधिक प्यार व सम्मान दिया कर होते हुए अन्याय को देखकर क्रोध में आकर दक्ष ने चंद्रदेव को शाप दे दिया कि अब से हर दिन तुम्हारा तेज (काँति, चमक) क्षीण होता रहेगा। फलस्वरूप हर दूसरे दिन चंद्र का तेज घटने लगा। शाप से विचलित और दु:खी सोम ने भगवान शिव की आराधना शुरू कर दी। अंततः शिव प्रसन्न हुए और सोम-चंद्र के श्राप का निवारण किया। सोम के कष्ट को दूर करने वाले प्रभु शिव का स्थापन यहाँ करवाकर उनका नामकरण हुआ "सोमनाथ"।
सोमनाथ शिवजी की मूर्ति

     जगह पर द्वितीय बार मंदिर का पुनर्निर्माण सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने किया। आठवीं सदी में सिन्ध के अरबी गवर्नर जुनायद ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी।गुर्जर प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका तीसरी बार पुनर्निर्माण किया। इस मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी। अरब यात्री अल-बरुनी ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका विवरण लिखा जिससे प्रभावित हो महमूद ग़ज़नवी ने सन १०२४ में कुछ ५,००० साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। ५०,००० लोग मंदिर के अंदर हाथ जोडकर पूजा अर्चना कर रहे थे, प्रायः सभी कत्ल कर दिये गये।
             इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। सन 1297 में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर क़ब्ज़ा किया तो इसे पाँचवीं बार गिराया गया। मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः 1706 में गिरा दिया। इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बनवाया और पहली दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।
          १९४८ में प्रभासतीर्थ, 'प्रभास पाटण' के नाम से जाना जाता था। इसी नाम से इसकी तहसील और नगर पालिका थी। यह जूनागढ़ रियासत का मुख्य नगर था। लेकिन १९४८ के बाद इसकी तहसील, नगर पालिका और तहसील कचहरी का वेरावल में विलय हो गया। मंदिर का बार-बार खंडन और जीर्णोद्धार होता रहा पर शिवलिंग यथावत रहा। लेकिन सन १०२६ में महमूद गजनी ने जो शिवलिंग खंडित किया, वह यही आदि शिवलिंग था। इसके बाद प्रतिष्ठित किए गए शिवलिंग को १३०० में अलाउद्दीन की सेना ने खंडित किया। इसके बाद कई बार मंदिर और शिवलिंग को खंडित किया गया। बताया जाता है आगरा के किले में रखे देवद्वार सोमनाथ मंदिर के हैं। महमूद गजनी सन १०२६ में लूटपाट के दौरान इन द्वारों को अपने साथ ले गया था।
        सोमनाथ मंदिर के मूल मंदिर स्थल पर मंदिर ट्रस्ट द्वारा निर्मित नवीन मंदिर स्थापित है। राजा कुमार पाल द्वारा इसी स्थान पर अन्तिम मंदिर बनवाया गया था। सौराष्ट्र के मुख्यमन्त्री उच्छंगराय नवलशंकर ढेबर ने १९ अप्रैल १९४० को यहां उत्खनन कराया था।
        इसके बाद भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने उत्खनन द्वारा प्राप्त ब्रह्मशिला पर शिव का ज्योतिर्लिग स्थापित किया है। सौराष्ट्र के पूर्व राजा दिग्विजय सिंह ने ८ मई १९५० को मंदिर की आधारशिला रखी तथा ११ मई १९५१ को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में ज्योतिर्लिग स्थापित किया। नवीन सोमनाथ मंदिर १९६२ में पूर्ण निर्मित हो गया। १९७० में जामनगर की राजमाता ने अपने पति की स्मृति में उनके नाम से 'दिग्विजय द्वार' बनवाया। इस द्वार के पास राजमार्ग है और पूर्व गृहमन्त्री सरदार बल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा है। सोमनाथ मंदिर निर्माण में पटेल का बड़ा योगदान रहा।
बाणस्तम्भ


            मंदिर के दक्षिण में समुद्र के किनारे एक स्तंभ है। उसके ऊपर एक तीर रखकर संकेत किया गया है कि सोमनाथ मंदिर और दक्षिण ध्रुव के बीच में पृथ्वी का कोई भूभाग नहीं है  इस स्तम्भ को 'बाणस्तम्भ' कहते हैं। मंदिर के पृष्ठ भाग में स्थित प्राचीन मंदिर के विषय में मान्यता है कि यह पार्वती जी का मंदिर है।

              मन्दिर संख्या १ के प्रांगण में हनुमानजी का मंदिर, पर्दी विनायक, नवदुर्गा खोडीयार, महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा स्थापित सोमनाथ ज्योतिर्लिग, अहिल्येश्वर, अन्नपूर्णा, गणपति और काशी विश्वनाथ के मंदिर हैं। अघोरेश्वर मंदिर नं. ६ के समीप भैरवेश्वर मंदिर, महाकाली मंदिर, दुखहरण जी की जल समाधि स्थित है। पंचमुखी महादेव मंदिर कुमार वाडा में, विलेश्वर मंदिर नं. १२ के नजदीक और नं. १५ के समीप राममंदिर स्थित है। नागरों के इष्टदेव हाटकेश्वर मंदिर, देवी हिंगलाज का मंदिर, कालिका मंदिर, बालाजी मंदिर, नरसिंह मंदिर, नागनाथ मंदिर समेत कुल ४२ मंदिर नगर के लगभग दस किलो मीटर क्षेत्र में स्थापित हैं।

वेरावल प्रभास क्षेत्र के मध्य में समुद्र के किनारे मंदिर बने हुए हैं 
 शशिभूषण मंदिर, भीड़भंजन गणपति, बाणेश्वर, चंद्रेश्वर-रत्नेश्वर, कपिलेश्वर, रोटलेश्वर, भालुका तीर्थ है। भालकेश्वर, प्रागटेश्वर, पद्म कुंड, पांडव कूप, द्वारिकानाथ मंदिर, बालाजी मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर, रूदे्रश्वर मंदिर, सूर्य मंदिर, हिंगलाज गुफा, गीता मंदिर, बल्लभाचार्य महाप्रभु की ६५वीं बैठक के अलावा कई अन्य प्रमुख मंदिर है।
प्रभास खंड में विवरण है कि सोमनाथ मंदिर के समयकाल में अन्य देव मंदिर भी थे।
इनमें शिवजी के १३५, विष्णु भगवान के ५, देवी के २५, सूर्यदेव के १६, गणेशजी के ५, नाग मंदिर १, क्षेत्रपाल मंदिर १, कुंड १९ और नदियां ९ बताई जाती हैं। एक शिलालेख में विवरण है कि महमूद के हमले के बाद इक्कीस मंदिरोंo का निर्माण किया गया। संभवत: इसके पश्चात भी अनेक मंदिर बने होंगे।
सोमनाथ से करीब दो सौ किलोमीटर दूरी पर प्रमुख तीर्थ श्रीकृष्ण की द्वारिका है। यहां भी प्रतिदिन द्वारिकाधीश के दर्शन के लिए देश-विदेश से हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। यहां गोमती नदी है। इसके स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। इस नदी का जल सूर्योदय पर बढ़ता जाता है और सूर्यास्त पर घटता जाता है, जो सुबह सूरज निकलने से पहले मात्र एक डेढ फीट ही रह जाता है।
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